राजस्थान के प्रमुख प्रजामण्डल आन्दोलन

राजस्थान के प्रमुख प्रजामण्डल आन्दोलन

1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जनमानस में स्वंतन्त्रता की ललक उत्पन्न हो गई। 1885 में ब्रिटिश भारत में राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की स्थापना के बाद स्वतंत्रता आन्दोलन एक नया स्वरूप लेने लगा। लेकिन रियासतों की जनता को इस राष्ट्रीय आन्दोलन की धारा से अलग रखा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और महात्मा गाँधी की यही नीति थी रियासतों के मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करे तथा रियासतों की समस्याओं का स्थानीय स्तर पर ही निपटारा किया जाये। कांग्रेस पार्टी के नागपुर अधिवेशन में जनता के प्रति सकारात्मक रूख अपनाते हुए तुरन्त प्रताव पारित किया गया कि और देशी राजाओं से अपेक्षा की गई वे अपनी प्रजा को ऐसा शासन प्रदान करे कि जिसमें उनका प्रतिनिधित्व व भागीदारी हो। 1927 के मद्रास अधिवेशन में कांग्रेस ने दृढ़ शब्दों में प्रस्ताव पारित कर कहा कि देशी राजाओं को अपने राज्यों में शीघ्र प्रतिनिधि संस्थाएँ तथा उत्तरदायी शासन स्थापित करे।

सुभाष चन्द्र बोस की अध्यक्षता में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन को आन्दोलन में जागृति फैलाने का श्रेय जाता हैं तथा इस अधिवेशन में पहली बार निर्णय लिया कि कांग्रेस को रियासत की जनता का साथ देना चाहिए। 1938 में राजस्थान की सभी रियासतों में प्रजामण्डल की स्थापना हुई। पं. जवाहर लाल नेहरू को ’’अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद्’’ का अध्यक्ष बनाया था।

जयपुर प्रजामण्डल आंदोलन- 

1931 में राजस्थान में सर्वप्रथम जयपुर प्रजामण्डल की स्थापना हुई तथा इसकी स्थापना का श्रेय कपूरचन्द पाटनी को जाता है। जयपुर राज्य में सर्वप्रथम ’’राजनैतिक चेतना की अलख’’ हीरालाल शास्त्री ने जगाई थी। जयपुर प्रजामण्डल को राजनैतिक क्षेत्र में अधिक प्रभावी बनाने के लिए श्री हीरालाल शास्त्री के प्रयासों ’’जयपुर प्रजामण्डल’’ का पुनर्गठन किया। शास्त्रीजी ने अपनी संस्था ’’जीवन कुटीर’’ के सभी सदस्यों का इस संस्था में विलय कर दिया। इस नवगठित प्रजामण्डल का अध्यक्ष चिरंजीलाल मिश्र व मंत्री हीरालाल शास्त्री जी बने।

  • 1938 में जयपुर प्रजामण्डल के अध्यक्ष श्री जमना लाल बजाज बने।
  • 1938 में श्री हीरालाल शास्त्री जी के प्रयासों से शेखावटी किसान सभा का जयपुर प्रजामण्डल में विलय करवाया गया।
  • जयपुर प्रजामण्डल की सफलता को देखकर जयपुर रियासत ने जमनालाल बजाज व प्रजामण्डल के कार्यकलापों पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इसके विरोध में 5 फरवरी, 1939 को प्रजामण्डल ने सरकार का पुरजोर शब्दों में विरोध किया तथा इसके तहत 6000 सत्याग्रहियों ने गिरफ्तारियाँ दी। सत्याग्रह आन्दोलन का संचालन श्री बलवंत, सांवलराम देशपाण्डे, गुलाबचन्द कासलीवाल, कपूरचन्द पाटनी, दौलतराम भण्डारी आदि नेताओं ने किया। यहाँ श्रीमती दुर्गादेवी देवी शर्मा के नेतृत्व में महिला सत्याग्रहियों ने गिरफ्तारियां दी।
  • जयपुर सरकार द्वारा प्रजामण्डल को मान्यता देने तथा गिरफ्तार सत्याग्रहियों को रिहा करने के आश्वाiसन देने पर 18 मार्च, 1939 को सत्याग्रह को स्थागित कर दिया।
  • 2 अप्रैल, 1940 को सरकार व प्रजामण्डल के मध्य एक समौझता के दौरान उसी दिन ही प्रजामण्डल को पंजीकृत किया गया।
  • हीरालाल शास्त्री पंजीकृत प्रजामण्डल के अध्यक्ष नियुक्त हुए।
  • हीरालाल शास्त्री ने अध्यक्ष पद संभालते ही जयपुर में उतरदायी शासन की मांग की।

जेन्टलमेंन्स समझौता:-

जयपुर प्रजामण्डल के तत्कालीन अध्यक्ष हीरालाल शास्त्री एवं रियासत के प्रधानमंत्री सर मिर्जा इस्माइल को संतुष्ट करते हुए उनकी कुछ शर्तें मान ली इसके तहत महाराजा ने राज-काज में जनता को शामिल करने की अपनी नीति का उल्लेख किया।

भारत छोड़ो आन्दोलन में जयपुर प्रजामण्डल का योगदानः-

जयपुर प्रजामण्डल के तत्कालीन अध्यक्ष हीरालाल शास्त्री व मिर्जा इस्माइल के मध्य 1942 में हुए समझौते के तहत जयपुर प्रजामण्डल को भारत छोडो आन्दोलन में पूर्णतः निष्क्रिय रखा। भारत छोडो़ आन्दोलन के तहत जयपुर प्रजामण्डल दो गुटों में विभाजित हो गया। एक गुट जो यह चाहता था कि भारत छोड़ो आन्दोलन में जयपुर प्रजामण्डल निष्क्रिय रहे इस गुट के प्रबल समर्थक हीरालाल शास्त्री थे। दूसरा गुट यह चाहता था कि जयपुर प्रजामण्डल भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग ले इसके प्रबल समर्थक थे- बाबा हरिषचन्द्र, रामकरण जोशी, हंस डी. राय, दोलतमल भंडारी आदि नेता शामिल थे। इसमें से जो शास्त्री जी के समर्थक नहीं थे, जिन्होंने मिलकर 1942ई. में ’’आजाद मोर्चा’’ की स्थापना की। आजाद मोर्चा का नेतृत्व बाबा हरिषचन्द्र ने किया था। भारत छोड़ो आन्दोलन के तहत सिद्धराज ढ़ड्डा सहित अनेक नेताओं ने गिरफ्तारी दी। इसी के साथ ही जयपुर में भारत छोड़ो आन्दोलन का शुभारंम्भ कर दिया। 26 अक्टूबर, 1943 को जयपुर महाराजा ने संवैधानिक सुधार हेतु एक समिति का गठन किया। इसकी रिपोर्ट 1943 को राज्य सरकार को भेजी।

इस रिर्पोट के तहत दो प्रावधान थे-

  • एक विधानसभा।
  • एक प्रतिनिधि सभा की स्थापना करने तथा कार्यपालिका में से कम से कम आधे मंत्री जनता द्वारा निर्वाचित विधानसभा से लेने की सिफारिश की।
  • 1 जून, 1944 को संवैधानिक सुधारों की घोषणा के तहत् ’’जयपुर राज्य सरकार अधिनियम’’ पारित हुआ। 1945 ई. में विधानसभा एवं प्रतिनिधि सभा के निर्वाचन हुए इसमें विधान सभा की 51 सीटों का चुनाव हुआ इस में से 27 सीटें प्रजामण्डल के खाते में आई। इससे देखते हुए प्रजामण्डल को कोई विेशेष सफलता नहीं मिली।
  • 1945 में पं. जवाहर लाल नेहरू के कहने पर आजाद मोर्जा जयपुर प्रजामण्डल में विलय हो गया।
  • राज्य के मंत्रिमडल में जयपुर प्रजा मण्डल के अध्यक्ष देवीशंकर तिवाड़ी को शामिल किया।
  • जयपुर राज्य राजस्थान का पहला राज्य बना जिसने अपने मंत्रिमण्डल में गैर-सरकारी सदस्य नियुक्त किया।
  • 1946 ई. में ही प्रजामण्डल ’’अखिल भारतीय लोकपरिषद्’’ का अंग बन गया तथा इसे जयपुर जिला कांग्रेस के नाम से जाना जाने लगा।
  • 3 जून, 1947 को ब्रिटिश सरकार द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा करने बाद जुलाई 1947 जयपुर के महाराजा ने नरेन्द्र मण्डल की सभा में भारत संघ में मिलने घोषणा कर दी।

मेवाड़ प्रजामण्डल-

  • मेवाड़ भूमि पर अनेक आन्दोलन हुए जैसे बिजौलिया आन्दोलन, बेंगू आन्दोलन तथा इसकी सफलता से प्रेरित होकर मेवाड़ में राजनैतिक आन्दोलन की शुरूआत हुई। उदयपुर(मेवाड़) प्रजामण्डल आंदोलन की स्थापना का श्रेय श्री माणिक्यलाल वर्मा को जाता है तथा इस प्रजामण्डल का मूलरूप से उद्देश्यग जनता के अधिकारों और संवैधानिक सुधारों की मांग तथा जनता के आर्थिक कष्टों का निवारण था। 24 अप्रैल, 1938 को बलवन्तसिंह मेहता की अध्यक्षता मेवाड़ में प्रजामण्डल की स्थापना की। इसका उपाध्यक्ष भूरेलाल बंया तथा मंत्री माणिक्य लाल वर्मा को बनाया। प्रजामण्डल की लोकप्रियता बढ़ती देख उदयपुर महाराजा ने 24 जून, 1938 में इसको अवैध घोषित कर दिया, तथा माणिक्य लाल वर्मा को मेवाड़ से निष्कासित कर दिया। बाद में वर्मा जी महात्मा गाँधी के पास वर्धा चले गये तथा इनसे मिलने के बाद अजमेर लौटकर अपना इसे अस्थाई मुख्यालय बनाकर अजमेर को अपनी कर्मस्थली बनाई तथा ’’मेवाड़ का वर्तमान शासन’’ नामक पुस्तक का प्रकाशन कर तत्कालीन सरकार की कटू आलोचना की, लोगों में जागृति लाने के लिए ’’मेवाड़ प्रजामण्डलः मेवाड़वासियों से एक अपील’’ नामक पर्चे बांटे, सरकार ने कार्यवाही के तौर पर डाक सेंसर लगा दिया। किसी भी प्रकार की सभा, समारोह करने, संस्थाए बनाने से पहले सरकार से अनुमति लेनी होगी। प्रजामण्डल के कार्यकर्ताओं ने सरकार को चेतावनी दी कि अगर 4 अक्टूबर तक मेवाड़ प्रजामण्डल पर लगा प्रतिबन्ध नहीं हटाया गया तो सत्याग्रह प्रारम्भ किया जायेगा। सरकार ने प्रजामण्डल कार्यकर्ताओं की बात अनसुनी कर दी। प्रजामण्डल कार्यकर्ता भूरे लाल बयां ने दिल्ली में गाँधी जी से वार्तालाप कर विजयदशमी के दिन सत्याग्रह को आरम्भ करने का निर्णय किया। परन्तु भूरे लाल बयां को दिल्ली से उदयपुर आते ही उदयपुर स्टेशन पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा गिरफ्तार करके उन्हे सराड़ा किले (मेवाड़ का काला पानी) में नजर बन्द कर दिया।
  • मेवाड़ मे सत्याग्रह आन्दोलन का श्रेय सर्वप्रथम प्रजामण्डल कार्यकर्ता रमेशचन्द्र व्यास को प्राप्त हुआ। 24 जनवरी, 1939 को श्री माणिक्य लाल वर्मा की पत्नी श्रीमती नारायणीदेवी व पुत्री श्रीमती स्नेहलता पुत्र दीनबन्धु को भी मेवाड़ में प्रवेश किया गया, 2 फरवरी, 1939 को ’’ऊंजा’’ गाँव में धोखे से वर्मा को पकड़ लिया तथा उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाकर ’’कुम्भलगढ़ के किले’’ नजर बंद कर दिया गया। स्वास्थ्य सम्बधी कारणों से नेहरू जी ने मेवाड़ सरकार को पत्र लिख वर्मा जी को रिहा करने की अपील की तथा मेवाड़ सरकार ने 8 जनवरी, 1940 को रिहा कर दिया। मेवाड़ प्रजामण्डल ने ’’बेगार एवं बलेठ’’ के विरूद्ध आन्दोलन चलाया तथा सरकार ने इन दोनों ही प्रथाओं पर रोक लगाई ’’ यह मेवाड़ प्रजामण्डल की एक नैतिक विजय’’ थी। मेवाड़ के प्रधानमंत्री श्री धर्मनारायण की जगह नए प्रधानमंत्री श्री टी. विजय राघवाचार्य बने। 22 फरवरी, 1941 को प्रधानमंत्री की सिफारिश पर महाराणा भक्तसिंह के जन्म दिवस के अवसर पर मेवाड़ प्रजामण्डल पर लगी पाबंदी हटा ली गई। शासन के विरूद्ध मेवाड़ प्रजामण्डल की यह प्रथम जीत थी। 26 नवम्बर, 1941 को श्री माणिक्यलाल वर्मा की अध्यक्षता में मेवाड़ प्रजामण्डल का प्रथम अधिवेशन उदयपुर की ’’शाहपुरा हवेली’’ में आयोजित किया गया। इसका उद्घाटन आचार्य जे.बी. कृपालानी ने किया गया। प्रजामण्डल के इस अधिवेशन में अपार भीड़ के सम्मुख वर्मा जी ने राज्य में उतरदायी शासन की स्थापना, सरकार द्वारा प्रस्तावित धारा सभा में नागरिक अधिकारों की बहाली की। मेवाड़ प्रजामण्डल ने कांग्रेस द्वारा 9 अगस्त 1942 को शुरू ’’ भारत छोड़ो आन्दोलन’’ में भाग लेना शुरू किया तथा मेवाड़ प्रजामण्डल ने सरकार को पत्र लिख कर चेतावनी दी कि यदि 24 घण्टे के भीतर महाराणा ने ब्रिटिश सरकार से सम्बंधों से किनारा नहीं किया तो मेवाड़ प्रजामण्डल के नेतृत्व में ’’जन आन्दोलन’’ किया जायेगा। मेवाड़ सरकार ने इस चेतावनी की प्रतिक्रिया देते हुए प्रजामण्डल के कार्यकारी सदस्यों को गिरफ्तार किया तथा सरकार के दमन के विरोध में कार्यकर्ताओं ने सर्वत्र ’’अंग्रेजों भारत छोड़ो’’ आन्दोलन का नारा बुलन्द किया।
  • प्रजामण्डल ने भील सेवा कार्य, भील छात्रावास जैसे कार्यो को वापस चालू किया तथा इसके साथ ही ’’मेवाड़ हरिजन सेवक संघ’’ के कार्यो को पुनः शुरू किया।
  • 1 जनवरी, 1946 को उदयपुर के सलेटिया मैदान में ’’अखिल भारतीय देशी लोक राज्य परिषद’’ का छठे अधिवेशन का आयोजन किया जिसकी अध्यक्षता पं. नेहरू जी ने की। जिसमें प्रस्ताव पारित कर देशी रियासतों को अविलम्ब उतरदायी शासन लागू करने की अपील की।
  • मेवाड़ सरकार ने ठाकुर गोपालसिंह की अध्यक्षता में 8 मई, 1946 को संविधान निर्मात्री सभा का गठन किया इस सभा में प्रजामण्ड़ल के भी 5 सदस्य शामिल थे। 29 सितम्बर, 1946 को इस समिति ने राज्य में उतरदायी शासन की स्थापना तथा सरकार जनता द्वारा निर्वाचित सदस्यों को सौंपना तथा 50 सदस्यीय संविधान सभा का गठन करने का सुझाव दिया, लेकिन सरकार ने इस सभा की रिपोर्ट अस्वीकार कर दिया।
  • 3 मार्च, 1947 को मेवाड के भावी संविधान की रूपरेखा की घोषणा की तथा धारा सभा का गठन किया जिसके अनुसार 46 सदस्य होगें। इनमें 18 सीटें विशिष्ट वर्गों हेतु सुरक्षित रखे तथा 28 सीटें संयुक्त निर्वाचन प्रणाली द्वारा जनता से चुनी जानी थी।
  • मेवाड़ के संवैधानिक सलाहकार के. एम. मुंशी द्वारा 23 मई, 1947 को संवैधानिक सुधारों की नई योजना प्रस्तुत की गई। जिसमें 56 सदस्यीय विधान सभा के गठन का प्रावधान रखा था।
  • 11 अक्टूबर, 1947 को महाराणा ने मोहनसिंह मेहता को संविधान में संषोधन करने हेतु नियुक्त किया। जिसके पश्चाmत् मेवाड़ प्रजामण्डल ने विधान सभा चुनावों में भाग लेने निश्चिय किया।
  • 18 अप्रैल, 1948 को उदयपुर राज्य का राजस्थान में विलय हो गया। अन्ततः मेवाड़ प्रजामण्डल के सामने सरकार को झुकना पड़ा और धीरे-धीरे उतरदायी शासन की स्थापना हुई।
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