राजस्थान के प्रमुख कृष्ण मन्दिर

राजस्थान के प्रमुख कृष्ण मन्दिर

श्री नाथ जी का मन्दिर- नाथद्वारा (राजसमन्द)-

  • बनास नदी के किनारे बसे नाथद्वारा का अन्य नाम नन्दगाँव हैं, इसका प्राचीन नाम सिहाड़ गाँव था।
  • इस मंदिर का महाराणा राजसिंह प्रथम ने करवाया था। श्रीकृष्ण की काली मूर्ति औरंगजेब के शासन काल में दामोदर तिलकायत द्वारा वृंदावन से लाई गई थी तथा यह मंदिर वल्लभ सम्प्रदाय (वैष्णव सम्प्रदाय का एक भाग) से सम्बन्धित हैं।
  • श्री नाथ जी को ’’सप्तध्वजा का स्वामी या नाथ’’ भी कहा जाता है।
  • श्री नाथ जी के मंदिर को ’’हवेली’’ गीत को ’’हवेली संगीत’’ नृत्य को ’’डांग नृत्य’’ तथा दर्शन को ’’झांकी’’ कहा जाता है।
  • श्री नाथ जी का ’’अष्ठ झरोखा कदली झांकी’’ (केले के पतों से) प्रसिद्ध हैं।
  • श्री नाथ जी की बादशाह की होली व अन्नकूट महोत्सव प्रसिद्ध है इस महोत्सव पर भीलों द्वारा चावल लूटने की परम्परा है।

विशेष- बादशाह मेला- ब्यावर (बीरबल नृत्य), बादशाह सवारी- कोटा।

  • श्री नाथ जी की गौत्र के ठाकुर ’’नवनीत प्रिया जी’’ को श्रीलालन कहते हैं।
  • श्री नाथजी के पाने मे 24 श्रृंगारों का वर्णन मिलता है जो रास्थान का सबसे कलात्मक पाना हैं।
  • श्री नाथजी की पिछवाईयां विश्वह प्रसिद्ध हैं जिनमें श्रीकृष्ण की रास-लीलाओं का वर्णन हैं। इन पिछवाईयों का वृहत विवरण रॉबट स्केलटन की पुस्तक ’’राजस्थानी टेम्पल्स हैंगिग्स ऑन द कृष्णा क्लस्ट’’ में मिलता है।

द्वारिकाधीष मंदिरः- कांकरौली (राजसमन्द)

  • इस मंदिर का निर्माण भी राजसिंह ने करवाया था, यह मन्दिर वैष्णव सम्प्रदाय के वल्लभ सम्प्रदाय से सम्बन्धित हैं।
  • इस मन्दिर के प्रांगण में भिति चित्रों का संग्रहालय हैं। इस मंदिर की प्रतिमा पहले कांकरौली के निकट आसोतिया गाँव में थी।

विशेष- कांकरौली टायर ट्यूब के लिए प्रसिद्ध हैं।

खाटू श्याम का मंदिरः- दांता रामगढ़ (सीकर)

  • इस मंदिर का निर्माण अभयसिंह के काल में हुआ। इसे ’’शीष का दानी’’ तथा ’’हारे का सहारा’’ भी कहते हैं तथा यह भीम के पुत्र घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक थे।
  • फाल्गुन शुक्ल एकादशी व द्वादशी को यहाँ लक्खी मेला लगता है।

गोविन्द देव जी का मन्दिर (जयपुर)-

  • ये जयपुर के आराध्य देव है तथा इनके मन्दिर का निर्माण 1735 ई. में सवाई जयसिंह द्वितीय ने करवाया था।
  • इस मन्दिर परिसर में स्थित सत्संग भवन विश्वण में बिना खम्बों वाला सबसे बड़ा भवन हैं तथा इसका नाम ’’गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड’’ में दर्ज है।

विशेष- इसको दर्शन हेतु इन्टरनेट पर जारी किया गया है।

जगत् शिरोमणि का मंदिर-आमेर (जयपुर)-

  • इस मंदिर का निर्माण मानसिंह की पत्नी कनकावती ने पुत्र जगत की स्मृति में करवाया तथा इस मंदिर पर मुगल शैली का प्रभाव पड़ा हैं।
  • इस मंदिर में श्रीकृष्ण की वही प्रतिमा हैं जिसकी मीरांबाई पूजा करती थी इसीलिए इसे ’’मीरा मन्दिर’’ भी कहा जाता है।

मदन मोहन जी का मन्दिर (करौली)-

  • यह मन्दिर गौड़ीय सम्प्रदाय से सम्बन्धित हैं।

बंशी वाले का मंदिर – नागौर:-

  • हीराचन्द ओझा ने इसे ’’मुरलीधर मंदिर’’ कहा है।

मथुराधीष का मन्दिर- कोटाः-

  • यह मन्दिर वैष्णव सम्प्रदाय के वल्लभ सम्प्रदाय से सम्बन्धित हैं। इस मन्दिर का निर्माण वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ जी ने करवाया।
  • देश में 7 वल्लभ सम्प्रदाय की पीठों में एक यह भी शामिल हैं। यहाँ नन्द महोत्सव, दीपावली पर अन्नकूट महोत्सव तथा होली उत्सव मनाये जाते है।

कुम्भश्याेेम मन्दिर- (चित्तौड़):-

  • इस मंदिर का निर्माण कुम्भा ने करवाया यह मूलतः शिव मन्दिर था, जिसको बाद में विष्णु मंदिर बनाया गया।
  • इस मंदिर में विष्णु के वराह अवतार की प्रतिमा हैं। यह मंदिर इण्डो-आर्यन स्थापत्य कला का सुन्दर नमूना हैं।
  • इस मंदिर के पास मीरां बाई का मंदिर हैं जिसमें भगवान कृष्ण की काले पत्थर की मूर्ति है मीरां बाई के इस मन्दिर के सामने मीरांबाई के गुरू रैदास की छतरी हैं।

सांवलिया/सांवरिया सेठ का मंदिर-मंडपिया (चित्तौडगढ़)-

  • यह मंदिर अफीम मंदिर के नाम से जाना जाता हैं। यहाँ पर श्री कृष्ण की काले पत्थर की प्रतिमा हैं तथा यहाँ पर मेला जलझुलनी ग्यारस को लगता है।

चार भुजा मन्दिर- गढ़गबोर (राजसमन्द)-

  • यह मन्दिर मेवाड़ की प्राचीन 4 धामों में शामिल हैं। (केसरिया जी, कैलाशपुरी, नाथद्वारा व चारभुजा जी)
  • इस चार भुजाओं वाली प्रतिमा की पूजा पाण्डवों द्वारा भी की गई थी। यहाँ पर होली व देवझूलनी ग्यारस को मेला लगता है।

विशेष- चारभुजा जी को ’’मेवाड़ का वारी नाथ’’ कहते हैं।

काचरिया मंदिर- किशनगढ़ (अजमेर)-

  • इस मन्दिर में कृष्ण व राधा की प्रतिमा है तथा इनकी पूजा निम्बार्क सम्प्रदाय द्वारा की जाती हैं।
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