राजस्थान के अन्य प्रमुख मंदिर

राजस्थान के अन्य प्रमुख मंदिर

गणेश जी के मंदिर

त्रिनेत्र गणेश मंदिर – रणथम्भौर (सवाई माधोपुर)

  • इसे रणत भंवर गजानन्द तथा लेटे हुए गणेश जी भी कहते हैं।
  • यहाँ पर देश का सबसे प्राचीन गणेश मेला भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भरता हैं, तथा यह मेला राजस्थान का सबसे प्राचीन गणेश मेला हैं।
  • यहाँ पर गणेश जी की प्रतिमा में गर्दन, हाथ व शरीर नहीं हैं केवल मुख की पूजा होती हैं। यह विश्व का एकमात्र ऐसा गणेश मंदिर है जहाँ केवल मुख की पूजा होती हैं।

बाजणा गणेश- सिरोही

  • इस मन्दिर के पास एक झरना बहता हैं।

हेराम्ब गणपति का मन्दिर – बीकानेर

  • यह मंदिर बीकानेर में स्थित 33 करोड़ देवी-देवताओं के मंदिर में स्थित हैं।
  • अनूपसिंह द्वारा निर्मित इस मन्दिर में सिंह पर सवार है- गणेश जी।

मोती डूंगरी गणेश मन्दिर (जयपुर)

  • माधोसिंह प्रथम द्वारा निर्मित इस मन्दिर में गणेश जी आद्मकद मूर्ति है। इस मूर्ति को माधोसिंह की पत्नी मावली से लाई थी।

गढ़ गणेश – जयपुर

खड़े गणेश – कोटा

नाचणा गणेश – अलवर

हनुमान जी के मंदिर

पाण्डुपोल (अलवर)

  • यहाँ पर लेटे हुए हनुमान जी की प्रतिमा है तथा यहाँ पर हनुमान जी का मेला भाद्रपद महीने में भरता है।
  • पाण्डुपोल में पाण्डवों को कौरवों ने अज्ञातवास के दौरान घेरा था, उस समय भीम ने गदा मारकर पहाड़ से रास्ता निकाला था।

वीर हनुमान जी का मंदिर (चैमू-सामोद, जयपुर)

  • इसमें हनुमान जी की वृद्ध प्रतिमा हैं तथा इस प्रतिमा का एक पैर पहाड़ी में धंसा हुआ हैं।

मेहन्दीपुर बालाजी (दौसा)

  • इसमें मूर्ति पर्वत का ही अंग है तथा यह हनुमान जी की बाल-प्रतिमा है, इस प्रतिमा के बांई ओर सदैव एक जलधारा बहती हैं तथा यह मन्दिर जयपुर-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग 11 पर स्थित हैं।
  • यह मन्दिर भूत-प्रेत, बुरी आत्माओं व जादू-टोने के निदान हेतु प्रसिद्ध है। मेहन्दीपुर बालाजी के पास प्रेतराज सरकार व भैंरव जी के मन्दिर हैं।

सालासर बालाजी का मन्दिर (चुरू)

  • आसोटा गाँव में हल चलाते वक्त एक किसान बाबा मोहनदास को दाढ़ी-मूंछ युक्त हनुमान जी की मूर्ति मिली, जिसने सुजानगढ़ तहसील के सालासर गाँव में इसका मंदिर बनवाया।
  • मन्दिर का आरम्भिक निर्माण दो मुस्लिम कारीगरों नूरा व दाऊद ने आरम्भ किया। यहाँ पर दाढी-मूंछ वाले हनुमान जी की पूजा होती है और इसे हनुवंत पीठ भी कहते हैं।
  • इस मन्दिर परिसर के बीच में एक जाल का पेड़ हैं तथा श्रृद्धालू मनोकामना के लिए इस पेड़ के नारियल व धागे बांधते हैं। यहाँ पर चैत्र व अश्विन पूर्णिमा को लक्खी मेला लगता हैं।

ब्रह्मा जी के मन्दिर

पुष्कर – अजमेरः-

  • यह मन्दिर सुरम्य घाटी/पुष्कर घाटी में स्थित हैं, सुरम्य घाटी गुलाब के लिए प्रसिद्ध हैं। पुष्कर में ब्रह्माजी का मंदिर होने के कारण पुष्कर को ब्रह्मा नगरी के नाम से भी जाना जाता हैं।
  • पुष्कर में ब्रह्माजी का विश्वद प्रसिद्ध व सबसे प्राचीन मन्दिर हैं। भारतीय पुरातत्व व सर्वेक्षण विभाग ने इसे राष्ट्रीय महत्त्व का स्मारक घोशित किया हैं।
  • इस मन्दिर का निर्माण शंकराचार्य ने करवाया था, लेकिन इसका पुनर्निर्माण 1809 में गोकुलचन्द पारीक ने करवाया। यहाँ पर ब्रह्माजी की आद्मकद चतुर्मुखी प्रतिमा हैं।
  • पुष्कर में ब्रह्माजी के द्वारा कमल की पंखुड़ियों को गिराकर पुष्कर का निर्माण किया गया।

आसोतरा- बालोतरा (बाड़मेर)

  • इस मंदिर का निर्माण बाबा खेताराम जी द्वारा करवाया गया। इस मन्दिर में ब्रह्माजी की मूर्ति के साथ उनकी पत्नी सावित्री जी की भी मूर्ति हैं।
  • इस मंदिर के समीप ही खेतेश्वजर महादेव का मंदिर हैं।

विशेष- पुष्कर की पहाड़ियों में वर्षा अधिक होने पर लूणी नदी में बाढ़ बालोतरा में आती है, बालोतरा तक लूणी नदी मीठी तथा इसके पश्चाकत् खारी हो जाती है। इसलिए इसे खारी-मीठी नदी भी कहते है।

छींछ- बांसवाड़ा

  • यहाँ पर 12वीं सदी में निर्मित ब्रह्माजी की आदमकद् मूर्ति वाला मन्दिर हैं।

बेणेश्वर धाम (डूंगरपुर) तथा मंचकुंण्ड (धौलपुर)

  • यहां पर भी ब्रह्माजी की मूर्ति स्थित हैं।

गुरूद्वारा बुड्ढ़ा जोहड़ (गंगानगर)

  • इस राजस्थान के सबसे प्रसिद्ध गुरूद्वारे का निर्माण संत फतेहसिंह ने 1954 में करवाया। इसे ’’राजस्थान का स्वर्ण मन्दिर’’ कहते हैं तथा यहाँ पर मेला श्रावण अमावस्या को लगता हैं।

रघुनाथ चूण्ड़ावत जी का मन्दिर- खेतड़ी (झुंझुनू)

  • इस मंदिर का निर्माण बख्तावर की पत्नी चूण्डावती द्वारा करवाया गया। यह विश्वी का एकमात्र मन्दिर है, जिसमें राम व लक्ष्मण की दाढ़ी-मूछ वाली प्रतिमा है।

कपिल मुनि का मेला- कोलायत (बीकानेर)

  • सांख्य दर्शन के जनक कपिल मुनि का जन्म पुष्कर में हुआ। कोलायत में प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा को मेला लगता है।
  • कपिल मुनि का मेला जांगल प्रदेश का सबसे बड़ा मेला हैं, कोलायत झील पर 52 घाट व 5 मन्दिर बने हुए है’’। यहाँ का दीपदान अत्यधिक प्रसिद्ध हैं।
  • कपिल मुनि के मेले में चारण जाति के लोग भाग नहीं लेते हैं।

लोहार्गल- झुंझुनू

  • यहाँ का सुर्य कुण्ड व मालकेतु मन्दिर प्रसिद्ध हैं तथा राजस्थान में 24 कोसीय परिक्रमा भी यहीं की प्रसिद्ध हैं जिसे मालखेत जी की परिक्रमा कहते हैं।

विशेष- 30 कोसी परिक्रमा (गिरीराज जी की, उतर प्रदेश), 84 कोसीय परिक्रमा (कामा- भरतपुर)

रावण का मन्दिर-मण्डोर (जोधपुर)

  • यह उत्तरी भारत का पहला रावण मंदिर हैं। रावण की पत्नी मन्दोदरी ओझा जाति की मण्डोर की रहने वाली थी। रावण के चित्र या मूर्ति अनुग्रहमूर्ति कहलाते हैं।

33 करोड़ देवी देवताओं के मन्दिर मण्डोर (जोधपुर)

  • इसे Hall of Heroes ’’वीरों की साल’’ भी कहा जाता है।

सूर्य मन्दिर – औंसिया (जोधपुर)

  • औंसिया को 24 मन्दिरों की नगरी भी कहते हैं। यह राजस्थान का सबसे प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर हैं इसका निर्माण 8वीं सदी में प्रतिहार शासक वत्सराज ने करवाया था।
  • इस मन्दिर को ’’राजस्थान का ब्लैक पैंगोड़ा’’ या ’’राजस्थान का कोणार्क’’ के नाम से भी जाना जाता है।

किराडू के मन्दिर- हाथामा गाँव (बाड़मेर)

  • किराडू का प्राचीन नाम किरातकूप था।
  • यहाँ पर रामायण, महाभारत व पौराणिक कथाओं पर आधारित मन्दिर स्थित हैं। यहाँ पर शैव, वैष्णव व जैन धर्म के मन्दिर स्थित है।

विशेष- यहाँ का प्रसिद्ध मन्दिर सोमेश्वर शिव मन्दिर हैं जो प्रतिहार शैली का अन्तिम व सर्वाधिक भव्य मन्दिर हैं। किराडू़ को ’’राजस्थान का खजुराहो’’’’मूर्तियों का खजाना’’ भी कहते हैं। यहाँ की मूर्तियों में सागर मंथन रामायण व महाभारत से सम्बन्धित तथा श्रीकृष्ण की लीलाओं के प्रसंग लोगों को अपनी तरफ खींचते हैं।

लोद्रवा के मन्दिर- (जैसलमेर)

  • यहाँ पर शाक्त, वैष्णव व जैन मन्दिर हैं। यहाँ का प्रमुख मंदिर हिंगलाज माता का मन्दिर हैं। यह माता चर्म रोग को दूर करती है। हिंगलाज माता का मूल मन्दिर पाकिस्तान में स्थित हैं।

वशिष्ट मुनि का मंदिरः- बसन्तगढ़ दुर्ग, आबू पर्वत (सिरोही)

  • यहाँ अग्नि कुण्ड स्थित हैं जिससे 4 राजपूत जातियों की उत्पति हुई थी।

सिरे मन्दिर (जालौर)

  • यह नाथ भूमि जालन्धर नाथ की तपो भूमि हैं, इस मन्दिर का निर्माण जोधपुर के राजा मानसिंह ने करवाया था।

मच्छन्दर मन्दिर (उदयपुर)

  • इसे शैय्या मन्दिर भी कहते हैं, यह सांजी निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं।

अर्थूना के मन्दिर- बांसवाड़ा

  • अर्थूना का प्राचीन नाम उत्थूनक था यहाँ पर शैव, वैष्णव व जैन धर्म के परमार शासकों द्वारा निर्मित मन्दिर है पूर्व में अर्थूना वागड़ के परमारों की राजधानी थी।
  • यहाँ के मन्दिरों में सबसे पुराना मण्डलेश्वर महादेव का मन्दिर है। यहाँ वियज राज परमार की बनवाई गई हनुमान जी की एक बड़ी प्रतिमा है।

गवरी बाई का मन्दिर-(डूंगरपुर)

  • इस मन्दिर का निर्माण शिव सिंह ने करवाया था। गवरी बाई को ’’वागड़ की मीरां’’’’मीरां बाई का अवतार’’ माना जाता हैं।

हरि/संत मावजी का मंदिर-साबला गाँव (डूंगरपुर)

  • इसे विष्णु का कलयुगी अवतार माना जाता है। इस मंदिर में निष्कलंक मावजी की मूर्ति हैं।

स्थापक का पत्थर मन्दिर (डूंगरपुर)

  • यहाँ पर पत्थरों की पूजा होती हैं।

विभीषण का मन्दिरः- कैथून (कोटा)

  • यह राजस्थान का एकमात्र विभीषण मन्दिर हैं यहाँ केवल विभीषण के शीष की पूजा रामभक्त मानकर की जाती है।

7 सहेलियों का मंदिर/पद्मनाथ मंदिर – झालारापाटन (झालावाड़)

  • इसे घण्टियों का मंदिर भी कहते हैं इस मंदिर में भगवान सूर्य ने घुटने तक जूते पहने है।
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