राजस्थान के प्रमुख जैन मन्दिर

राजस्थान के प्रमुख जैन मन्दिर

“रणकपुर या चैमुखा जैन मन्दिर- नांदिया गाँव (पाली)

  • इन मन्दिरों का निर्माण महाराणा कुम्भा के काल में धरणकशाह/ धरणशाह ने 1439 ई. में वास्तुकार देपाक की देखरेख में मथाई नदी के किनारे करवाया था। रणकपुर जैन मन्दिर की प्रतिष्ठा सोमसुन्दर सूरी द्वारा करवाई गई थी।
  • यहाँ का मुख्य मन्दिर प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ/ऋषभदेव को समर्पित हैं। इन मन्दिरों के निर्माण में धरातल में सेवाड़ी तथा दीवारों में सोनाणा (पाली) के पत्थरों का प्रयोग हुआ हैं।
  • यहाँ पर 1444 स्तम्भ, 84 शिखर तथा 28 मण्डप हैं। रणकपुर जैन मन्दिर के अन्य नाम- 1444 स्तम्भों का वन, नलिनी गुल्स विमान, त्रिलोक दीपक आदि हैं। मन्दिर के मुख्य दीवार की छत पर प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ की माता मारूदेवी की हाथी पर आसीन प्रतिमा हैं।
  • मुख्य मन्दिर के सामने पार्श्वननाथ का मन्दिर हैं जिसमें अश्लील मूर्तियां हैं जिसके कारण इसे ‘पातरियों रो देहरो’ और वैष्या मन्दिर के नाम से भी जाना जाता हैं।

विशेष- इन मन्दिरों के बारे में फर्ग्युसन ने कहा- ‘‘ मैं अन्य कोई ऐसा भवन नहीं जानता जो इतना रोचक व प्रभावशाली हो और जो स्तम्भों की व्यवस्था में इतनी सुन्दरता व्यक्त करता हो’’

“दिलवाड़ा के जैन मन्दिर- माउण्ट आबू (सिरोही) यहाँ पर 5 मन्दिरों का समूह हैं-

1. आदिनाथ जैन मन्दिर या विमलवसहि जैन मन्दिर-

  • इस मन्दिर का निर्माण 1031 ई. में चालुक्य शासक भीम द्वितीय के मन्त्री विमलशाह ने करवाया था इसलिए इसे विमलवसहि का मन्दिर कहते हैं।
  • इस मन्दिर का शिल्पी कीर्तिधर था, इस मन्दिर के भीतरी भाग में खम्भे, छतें व मण्डप में आदि में बारीक तक्षण कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।
  • इस मन्दिर में सभा के आगे निज मन्दिर हैं जिसकी उंची वेदी पर सप्तधातु निर्मित आदिनाथ की प्रतिमा हैं जिसमें हीरों की आंखे हैं जो स्वयं प्रकाशवान होती हैं।
  • इस मन्दिर के बारे में कर्नल टॉड ने कहा ’’भारतवर्ष में ताजमहल के पश्चायत यदि कोई भी मन्दिर हैं तो वह विमलवसहि का मन्दिर हैं’’

2. नेमीनाथ मन्दिर या देवरानी जेठानी का मन्दिर-

  • इस मन्दिर को लूणवसहि का मन्दिर कहा जाता हैं। इसका निर्माण 1230 ई. में चालुक्य शासक वीरधवल के मन्त्री वास्तुपाल व तेजपाल के द्वारा करवाया गया।
  • इस मन्दिर में नेमीनाथ की काले पत्थर की प्रतिमा हैं। इस मन्दिर का शिल्पकार शोमनदेव था।

3. पितलहार या भीमशाह का मन्दिर-

  • इस मन्दिर में आदिनाथ की 108 मन की पीतल की प्रतिमा हैं इसका निर्माण 15 वीं सदी में भीमाशाह ने करवाया था।

4. खरतरवसही मन्दिर या पार्श्व नाथ जैन मन्दिर –

  • यह एक तीन मंजिला मन्दिर हैं, इस मन्दिर को सिलावटों का मन्दिर भी कहते हैं।

5. महावीर स्वामी का मन्दिर-

फालना के जैन मन्दिर

  • राजस्थान का प्रथम जैन मन्दिर का स्वर्णमन्दिर फालना में स्थित हैं। इसे गेटवे ऑफ गोल्डन व मिनी मुम्बई भी कहा जाता हैं।
  • यह मन्दिर त्रिशिखरी हैं जो रणकपुर व देलवाड़ा मन्दिरों की तर्ज पर बना हुआ हैं।

केसरियानाथ जी का मन्दिर- धुलेव गाँव (उदयपुर)

  • इसे कालाजी/ऋषभदेवजी/आदिनाथ जी आदि नामों से जाना जाता हैं, यहाँ पर मेला कोयल नदी के किनारे चैत्र कृष्ण अष्टमी को भरता हैं। इनकी केशर से पूजा की जाती है तथा भील इन्हें कालाजी कहते हैं।
  • राजस्थान सरकार द्वारा इसे जैन मन्दिर स्वीकार किये जाने के कारण यहाँ पर भीलों द्वारा हिंसक घटनाएं की गई, जिसके कारण सर्वोच्च न्यायालय ने इसे सभी धर्मों का मन्दिर स्वीकार किया था।
  • इस मन्दिर में पूजा जैन, आदिवासी व वैष्णव समाज के लोग करते हैं। यहाँ पर ऋषभदेव जी की 3 फीट ऊँची काली चमकीली प्रतिमा हैं। भील कालाजी की आण को सर्वोपरी मानते हैं। वैष्णव धर्म के लोग इसे विष्णु का अवतार मानते हैं।
  • यह मन्दिर बिना किसी चूने के जोड़ के 1100 खम्भों पर टिका हुआ हैं।

लोद्रवा के पार्श्व नाथ मन्दिर- लोद्रवा, जैसलमेर

  • यह प्राचीन युगल प्रेमी मूमल व महेन्द्रा का प्रणय स्थल हैं।

कालींजरा के जैन मन्दिर- बांसवाड़ा

  • यह मन्दिर हैरण नदी के किनारे हैं।

सतबीसी जैन मन्दिर- चितौड़गढ़

  • यहाँ पर 11वीं सदी में निर्मित 27 छोटे-छोटे जैन मन्दिर हैं, जिनमें 24 जैन तीर्थंकर की प्रतिमाएं स्थित हैं।
  • इन मन्दिरों की गुम्बदनुमा छत व खम्भों पर की गई खुदाई देलवाड़ा जैन मन्दिर माउण्ट आबू से मिलती जुलती हैं।

मूछाला महावीर जी का जैन मन्दिर- घाणेराव (पाली)

  • यहाँ पर दाढ़ी मूंछ वाले महावीर स्वामी की मूर्ति हैं। इस मन्दिर के पास ही गजानन्द का मन्दिर हैं जिसमें रिद्धी- सिद्धी की आद्मकद मूर्तियां हैं।

विशेष- पश्चिमी राजस्थान में महावीर स्वामी की सर्वाधिक मूर्तियां मिली हैं, इन्हें स्थानीय भाषा में जीवान्त स्वामी के नाम से भी जाना जाता हैं।

नाकोड़ा के जैन मन्दिर – नाकोड़ा (बाड़मेर)

  • ये मन्दिर भाकरिया नामक पहाड़ी पर बने हुए हैं। नाकोड़ा को मेवानगर या वीरमपुर के नाम से भी जाना जाता हैं।
  • यहाँ पर भैरवनाथ, शान्तिनाथ व पार्श्व नाथ के मन्दिर स्थित हैं। भगवान पार्श्वजनाथ व अधिष्ठनायक देव भैरव की महिमा इतनी विख्यात है कि इसे ‘हाथ का हुजुर’ तथा ‘जागती जोत’ भी कहा जाता हैं।

औंसिया के जैन मन्दिर- (जोधपुर)

  • ये मन्दिर प्रतिहार कालीन जैन मन्दिर हैं, धार्मिक सहिष्णुता व समभाव प्रतिहार कालीन युग की आत्मा हैं।
  • यहाँ पर विष्णु व शिव का समन्वित रूप हरिहर को समर्पित 8वीं शताब्दी के प्रतिहार युगीन तीन मन्दिर बने हुए हैं।
  • प्राचीनतम औंसिया का महावीर जैन मन्दिर पश्चिमी भारत का प्रथम जैन मन्दिर हैं। सच्चियाय माता श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय के ओसवाल समाज की कुलदेवी हैं।
  • औंसियां को 24 मन्दिरों की नगरी भी कहा जाता हैं।

भगवान कुंथुनाथ का जैन मन्दिर- देलवाड़ा (सिरोही)

  • इस मन्दिर के पास जिनदत सूरी की छतरी स्थित हैं।

सोनी जी की नसीयां (अजमेर)

  • यह ऋषभदेव को समर्पित हैं तथा यहाँ पर इस मन्दिर का निर्माण 1864-65 में मूलचन्द जी सोनी व उसके पुत्र टिकम जी सोनी द्वारा करवाया गया। लाल पत्थरों से निर्मित होने के कारण इसे लाल मन्दिर भी कहते हैं। इसकी छत पर स्वर्ण कलश रखा हुआ हैं।

चमत्कार जी का मन्दिर- आलनपुर (सवाईमाधोपुर)

  • इस मन्दिर में स्फटिक पाषाण की भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा स्थित हैं।

भांडाशाह जैन मन्दिर- बीकानेर

  • यह मन्दिर 5 वें जैन तीर्थंकर सुमतिनाथ को समर्पित हैं। यह तीन मंजिला मन्दिर बना हुआ हैं।
  • इस मन्दिर की पहली मंजिल पर भगवान सुमतिनाथ की श्वेत संगमरमर की आद्मकद प्रतिमा हैं, जिसके चारों ओर कांच का सुन्दर कार्य किया हुआ हैं तथा इस प्रथम मंजिल के निर्माण में पानी के स्थान पर घी प्रयोग किया गया था इसलिए इसे घी वाला मन्दिर भी कहते हैं। इसे त्रिलोक दीपक प्रसाद के नाम से भी जाना जाता हैं।

चन्द्रप्रभू जी का मन्दिर- तिजारा (अलवर)

चूलगिरी का मन्दिर- जयपुर

नारलाई के जैन मन्दिर – नारलाई (पाली)

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