राजस्थान की प्रसिद्ध मस्जिदें व मकबरे

राजस्थान की प्रसिद्ध मस्जिदें व मकबरे

अढ़ाई दिन का झोपड़ा (अजमेर):-

  • यह राजस्थान की प्रथम मस्जिद हैं, तथा इसका वस्तुकार अबू बकर था। अढ़ाई के झोपड़े का निर्माण बीसलदेव चैहान ने 1153 ई. के आस-पास संस्कृत विद्यालय सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय एवं विष्णु मंदिर के रूप में करवाया था। जिसको बाद में 1194 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तुड़वाकर मस्जिद में बदल दिया।
  • इस मस्जिद में प्रतिवर्ष पंजाब शाह संत की याद में अढ़ाई दिन का उर्स भरता हैं। इसलिए इसे अढ़ाई दिन का झोपड़ा कहते हैं। इसकी दीवार पर राजस्थान में फारसी भाषा का सबसे पुराना व बड़ा लेख अंकित है।
  • प्रसिद्ध इतिहासकार ड़ा. कीलहॉर्न को इस मस्जिद में बीसलदेव द्व़ारा रचित संस्कृत नाटक हरिकेलि तथा उनके दरबारी कवि सोमदेव द्वारा रचित नाटक ललित विग्रहराज का कुछ अंश उत्कीर्ण किया हुआ मिला है।
  • इन नाटक की प्रशंसा में डॉ. कीलहॉर्न ने कहा ’’ विग्रहराज जितना प्रतापी राजा था उतना ही बड़ा विद्वान था। उसका नाटक हरिकेलि कालीदास तथा भवभूति की रचनाओं से स्पर्धा कर सकता है।’’

ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर):-

  • ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह का निर्माण इल्तुतमिश ने करवाया था, तथा इस मस्जिद का निर्माण पूर्ण हूंमायू के काल में हुआ था।
  • ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती संजरी (फारस) से मौहम्मद गौरी के साथ पृथ्वीराज चैहान के काल में भारत आये थे, तथा इन्होंने अपना खानकाह अजमेर को बनाया। खानकाह उस स्थान को कहते हैं जहां पर सूफी संत रहते हैं।
  • राजस्थान में कव्वालियों का उदय खानकाह से ही हुआ था। ख्वाजा साहब के पिता का नाम हजरत ख्वाजा सैयद, माता का नाम साहेनूर तथा गुरू का नाम हजरत शेख उस्मान हारूनी था।
  • इस दरगाह में ख्वाजा साहब का उर्स 1 रज्जब से 6 या 9 रज्जब को लगता हैं, जिसका उद्घाट्न भीलवाड़ा निवासी गौरी परिवार करता हैं।

इस दरगाह में और भी कई इमारतें हैं-

बुलन्द दरवाजा- यह इस दरगाह की सबसे प्राचीन इमारत हैं जिसका निर्माण मांडू के सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने करवाया था।

जामा मस्जिद/शांहजहांनी मस्जिद- इसका निर्माण शाहजांह ने करवाया था।

महफिल खाना/शांहजहानी खाना- इसका निर्माण हैदराबाद दक्खन के निजाम नवाब मीर उस्मान अली ने करवाया था।

बड़ी देग व छोटी देग- बड़ी देग का निर्माण 1567 में अकबर तथा छोटी देग का निर्माण 1613 में जहांगीर ने करवाया था।

मुख्य मजार – इसका निर्माण ग्यासुद्दीन खिलजी (माण्डू) ने करवाया था। मुख्य मजार के पास बेगमी दाला हैं जिसका निर्माण शाहजहां की पुत्री जहांआरा ने करवाया था। मक्का के बाद ख्वाजा साहब की दरगाह को मुस्लिम सम्प्रदाय का संसार का दूसरा मक्का माना जाता हैं, अर्थात् अजमेर को संसार का दूसरा मक्का तथा भारत का मक्का कहा जाता हैं। ख्वाजा साहब के उर्स में आने वाले लोग जायरीन कहलाते हैं। यह दरगाह साम्प्रदायिक सद्भावना के लिए भी जानी जाती हैं। ख्वाजा साहब के 800 वें सालाना उर्स पर 27 मई 2012 को दरगाह पर 20 रूपये तथा जन्नती दरवाजे पर 5 रूपये का डाकटिकट जारी किया गया था। चिश्ती सम्प्रदाय में गुरू को पीर, शिष्य को मुरीद तथा उतराधिकारी को वलि कहते हैं।

अलाउद्दीन का मकबरा (चितौड़गढ़)-

  • इस मकबरे पर लगे हुए फारसी के लेख में अलाउद्दीन खिलजी को संसार का रक्षक तथा ईश्वर की छाया कहा हैं।

नरहड़ की दरगाह/हजरत शक्कर पीर बाबा की दरगाह- नरहड़ (झुंझुनू)

  • इस दरगाह में जन्माष्टमी को उर्स लगता हैं, यह दरगाह राजस्थान की सबसे बड़ी दरगाह हैं। नरहड़ पीर बाबा को बांगड़ का धणी भी कहा जाता हैं।

शेख हम्मीमुद्दीन चिश्ती की दरगाह- नागौर

  • शेख हम्मीमुद्दीन चिश्ती ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के शिष्य थे, इसलिए इसे राजस्थान का दूसरा ख्वाजा भी कहा जाता हैं। इसको ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती ने सुल्तान-ए-तारकीन अर्थात् सन्यासियों के सुल्तान की उपाधि दी थी।
  • शेख हम्मीमुद्दीन चिश्ती की मजार शफीक गिनाणी तालाब के निकट बनी हुई हैं। यहाँ पर राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा उर्स लगता हैं।

सैय्यद फखरूद्दीन की दरगाह- गलियाकोट

  • डूंगरपुर माही नदी के किनारे स्थित यह दरगाह दाउदी बोहरा सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थ स्थल हैं।

जामा मस्जिद- भरतपुर

  • महाराजा बलवन्त सिंह द्वारा निर्मित यह दिल्ली की जामा मस्जिद के नक्शे के आधार पर बनाई गई हैं।

जामा मस्जिद- शाहबाद

  • बांरा मुगल सम्राट औरंगजेब के समय सेनापति मकबूल द्वारा बनवाई गई यह मस्जिद शाहबाद में हैं।

अब्दुल्ला खां का मकबरा- अजमेर

  • इस मकबरे को बीबी का मकबरा कहते हैं।

हजरत दीवानशाह की दरगाह – कपासन

  • चितौड़गढ़ हिन्दू व मुस्लिम दोनों धर्मों की आस्था व श्रद्धा का प्रमुख केन्द्र हैं।

मीरान साहब की दरगाह- बूँदी

मीरान साहब की दरगाह – तारागढ़

  • अजमेर मीरान साहब की दरगाह में घोड़े की मजार हैं, इस मजार पर दाल चढ़ाने वालों की मनोकामना पूर्ण होती हैं।

हजरत ख्वाजा सैय्यद फखरूद्दीन चिश्ती की दरगाह- सनवाड़

  • अजमेर सनवाड़ में वर्ष भर जायरीन आते रहते हैं।

काकाजी की दरगाह- प्रतापगढ़

  • इस दरगाह को कांठल की दरगाह कहते हैं।

तोप मस्जिद-

  • जालौर दुर्ग 1311 में जालौर विजय के उपलक्ष में इस मस्जिद का निर्माण परमार वंशी राजा भोज द्वारा बनवाई गई कण्ठा भरण पाठशाला के स्थान पर अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर विजय के उपलक्ष में करवाया था।
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