हिन्‍दी विराम चिह्न

हिन्‍दी विराम चिह्न

Viram Chinh / Symbols / Punctuation

विराम चिह्न – ‘विराम’ का अर्थ है – ‘रुकना’ या ‘ठहरना’। वाक्‍य को लिखते अथवा बोलते समय बीच-बीच में कहीं थोड़ा-बहुत रुकना पड़ता है जिससे भाषा स्‍पष्‍ट, अर्थवान एवं भावपूर्ण हो जाती है। लिखित भाषा में इस ठहराव को दिखाने के लिए कुछ विशेष प्रकार के चिह्नों का प्रयोग करते हैं। इन्‍हें विराम-चिह्न कहा जाता है।

परिभाषा – वाक्‍यों में विराम के लिए प्रयोग किए जाने वाले संकेत-चिह्नों को विराम-चिह्न कहते हैं।

1. पूर्ण विराम ( । ) – पूर्ण विराम का अर्थ है – पूरा रुकना। प्रत्‍येक वाक्‍य की पूर्ण समाप्ति के बाद पूर्ण विराम ( । ) लगाया जाता है। (प्रश्‍नवाचक और विस्‍मयादिबोधक वाक्‍यों को छोड़कर)।

जैसे – आकाश में लालिमा छा गयी।

2. अर्द्धविराम ( ; ) – अर्द्ध विराम का अर्थ है – आधा ठहराव अर्थात् पूर्ण विराम से आधा ठहरना।

एक उपवाक्‍य या वाक्‍यांश का दूसरे उपवाक्‍य या वाक्‍यांश से दूर का संबंध दिखाने के लिए अर्द्धविराम (;) चिह्न लगाया जाता है।

जैसे – बिजली चमकी; फिर भी वर्षा नहीं हुई।

3. अल्‍प विराम ( , ) – अल्‍प विराम का अर्थ है – बहुत कम देर के लिए रुकना। इसका प्रयोग निम्‍नलिखित स्थितियों में होता है –

एक ही प्रकार के कई शब्‍दों का प्रयोग होने पर प्रत्‍येक शब्‍द के बाद अल्‍पविराम लगाया जाता है लेकिन अंतिम शब्‍द के पहले ‘और’ का प्रयोग होता है – जैसे – करेला, भिंडी, परवल और टमाटर खरीदे गए।

वाक्‍यांश या उपवाक्‍य को अलग करने के लिए जैसे-सुरेश विद्यालय जाता है, पर पढ़ता नहीं है।

शब्‍द युग्‍मों में अलगाव दिखाने के लिए जैसे रात और दिन, आज और कल, सफेद और काला।

क्रिया विशेषण वाक्‍यांशों के बाद भी अल्‍पविराम आता है।

तारीख के साथ महीने का नाम लिखने के बाद तथा सन्, संवत् के पहले अल्‍पविराम का प्रयोग किया जाता है; जैसे-15 अगस्‍त, सन् 1947 को भारत स्‍वतंत्र हुआ।

उद्धरण से पूर्व अल्‍पविराम का प्रयोग किया जाता है जैसे-गाँधीजी ने कहा, ‘करो या मरो’।

4. प्रश्‍नवाचक-चिह्न ( ? ) – प्रश्‍नात्‍मक वाक्‍यों के अंत में इस चिह्न का प्रयोग किया जाता है; जैसे वहाँ आप क्‍या कर रहे थे? क्‍या वे घर पर नहीं हैं?

इस चिह्न का प्रयोग संदेह प्रकट करने के लिए भी किया जाता है।

जैसे – क्‍या कहा, वे चोर है?

5. विस्‍मयादिबोधक चिह्न ( ! ) – सम्‍बोधन, हर्ष, विस्‍मय, घृणा, भय, व्‍यंग्‍य आदि की सूचना देने वाले वाक्‍यों में विस्‍मयादिबोधक चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

जैसे –

वाह! कितना सुन्‍दर दृश्‍य है।

तुम्‍हारा कल्‍याण हो!

छि:! छि:! कितनी गन्‍दकी है।

6. उद्धरण चिह्न / अवतरण चिह्न ( ‘ ‘, ” ” ) – उद्धरण चिह्न दो प्रकार के होते हैं – इकहरा एवं दुहरा।

(क) इकहरे उद्धरण चिह्न का प्रयोग निम्‍न स्थितियों में होता है –

(i) कवि के उपनाम में – सूर्यकान्‍त त्रिपाठी ‘निराला’, अयोध्‍या सिंह उपाध्‍याय ”हरिऔध”

(ii) किसी लेखक की रचना में – जयशंकर प्रसाद ने ‘कामायनी’ की रचना की।

(iii) वाक्‍य में जब किसी शब्‍द पर विशेष बल दिया जाता है।

योग दर्शन के प्रवर्तक ‘पतंजलि’ थे।

(iv) वाक्‍य के बीच में किसी विदेशी भाषा के शब्‍द आने पर उसका उत्तीर्ण होना ‘डाउटफुल’ है।

7. योजक चिह्न ( – ) – द्वित्‍व या सहचर शब्‍दों में योजक-चिह्न का प्रयोग होता है। योजक-चिह्न दो शब्‍दों को जोड़ता है। इस चिह्न का प्रयोग निम्‍नलिखित परिस्थितियों में किया जाता है –

(i) सामासिक पदों या पुनरुक्‍त और युग्‍म शब्‍दों के मध्‍य किया जाता है जैसे-रात-दिन, पाँच-पाँच, जय-पराजय, राष्‍ट्र-भक्ति।

(ii) तुलनात्‍मक शब्‍द ‘सा’, ‘सी’, ‘से’ के पहले;

जैसे- कमल-से पैर। कली-सी कोमलता।

8. निर्देशक चिह्न ( — ) – निर्देशक चिह्न का प्रयोग निम्‍नलिखित स्थितियों में किया जाता है –

(i) संवादों को लिखने में किया जाता है;

जैसे – श्‍याम तुम कहाँ पढ़ते हो?

(ii) किसी प्रकार की सूची के पहले –

जैसे – प्रथम श्रेणी के पास होने वाले छात्रों के नाम निम्‍नलिखित हैं राम, मोहन, श्‍याम, गीता, सीता, रमा।

9. कोष्‍ठक ( ) [ ] – कोष्‍ठक के भीतर मुख्‍यत: उन शब्‍दों को लिखते हैं जो मुख्‍य वाक्‍य का अंग होते हुए भी वाक्‍य से अलग की जा सकती है जैसे – वचन के प्रकार (एकवचन और बहुवचन) के उदाहरण दीजिए।

(i) किसी कठिन शब्‍द के अर्थ को स्‍पष्‍ट करने के लिए; जैसे-आपकी सामर्थ्‍य (शक्ति) को मैं जानता हूँ।

(ii) नाटकों में अभिनय को स्‍पष्‍ट करने हेतु पात्रों की क्रियाओं एवं मनोभावों का स्‍पष्‍टीकरण भी कोष्‍ठक के अन्‍तर्गत किया जाता है –

जैसे – अभिमन्‍यु (कुछ आगे बढ़कर) यदि वीर हो तो एक-एक करके मेरे साथ युद्ध करो।

(iii) विषय, विभाग सूचक अंकों अथवा अक्षरों को प्रकट करने के लिए; जैसे-अव्‍यय के चार भेद बताए गए हैं –

(1) क्रिया-विशेषण

(2) सम्‍बन्‍धबोधक

(3) समुच्‍चयबोधक

(4) विस्‍मयादिबोधक

10. हंसपद / त्रुटिबोधक (^) – जब किसी वाक्‍य अथवा वाक्‍यांश में कोई शब्‍द अथवा अक्षर लिखने में छूट जाता है तो छूटे हुए वाक्‍य के नीचे हंसपद चिह्न का प्रयोग कर छूटे हुए शब्‍द को ऊपर लिख देते हैं।

              मुझे

जैसे – तुम  ^  खून दो, मैं तुम्‍हें आजादी दूँगा।

11. रेखांकन चिह्न ( — ) – वाक्‍य में महत्त्वपूर्ण शब्‍द, पद, वाक्‍य रेखांकित कर दिया जाता है;

जैसे – कामायनी महाकाव्‍य जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित सर्वश्रेष्‍ठ कृति है।

12. लाघव चिह्न / संक्षेप चिह्न ( . ) – संक्षिप्‍त रूप में लिखने के लिए लाघव चिह्न का प्रयोग किया जाता है;

जैसे – ज. न. नि. = जयपुर नगर निगम

13. लोपसूचक चिह्न ( . . . . × × × ×) – जब वाक्‍य या अनुच्‍छेद में कुछ अंश छोड़कर लिखना हो तो लोप चिह्न का प्रयोग किया जाता है;

जैसे – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कहा है- लोकनायक वही हो सकता है जो ………. उनका सारा काव्‍य समन्‍वय ही विराट चेष्‍टा है।

14. विवरण चिह्न ( :- ) – किसी विषय का विवरण देने के लिए या उसकी व्‍याख्‍या करने हेतु विवरण चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

15. पुनरुक्ति सूचक चिह्न ( ” ” ) – जहाँ ऊपर लिखे गए अंश को नीचे की पंक्ति में यथावत् दुहराया गया हो वहाँ पुनरुक्ति सूचक चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

जैसे – श्रीमान् राजेन्‍द्र प्रसाद शर्मा

          ” अशोक कुमार चौधरी

          ” डॉ. अजयपाल द्विवेदी

16. अपूर्ण विराम / उपविराम ( : ) – आगे लिखी जा रही बात की ओर ध्‍यान आकृष्‍ट करने में, किसी व्‍यक्ति, वस्‍तु आदि का परिचय देने, पुस्‍तक या लेख के शीर्षक, जन्‍म व मृत्‍यु-तिथि में, साक्षात्‍कथन तथा कई जगह विसर्ग के रूप में भी उपयोग किया जाता है।

17. तारक या तारे का चिह्न (☆, ★) – पद या पाद टिप्‍पणी के लिए।

18. योग चिह्न ( + ) – दो या अधिक शब्‍दों को जोड़ने में। (सन्धि को दिखाने के लिए, शब्‍द व्‍युत्‍पत्ति बताने में।)

19. तुल्‍यतासूचक चिह्न ( = ) – समानता सूचित करने के लिए। (संधि, समास, किसी शब्‍द अर्थ आदि दिखाने के लिए)

20. तिर्यक रेखा ( / ) – ‘या’ एवं ‘अथवा’ के अर्थ में, कविता की पंक्तियों को अलग-अलग करने में।

21. गोला या गोली ( ● ) – मुख्‍य बातों या तथ्‍यों को सारांश रूप देने में।

22. समाप्ति सूचक चिह्न ( — ⃝ —, ●●●, ***, ★★★, ⃞⃞⃞ ) – लेख, गद्य, निबन्‍ध, अध्‍याय या पुस्‍तक की समाप्ति का बोध कराने में।

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